भ्रांतिमय

अंधेरा हो गया था और एक आदमी तेज़ी से चलते हुए एक ख़ामोश गली में जा रहा था, वो एक दरवाज़े के सामने रुक गया था। विशालकाय द्वार पर चाँदी की कुंडी जैसे वातावरण की नमी से ठंड पड़ गयी थी।

थोड़ी झिझक के साथ परंतु, मन को कठोर बनाकर उसने आगे बढ़कर कुंडी को खोला। एक असीम अंधेरे गलियारे के अंत में उसे प्रकाश की किरण दिखाई दी। उम्मीद की किरण की तरह वह तेज़ी से उस प्रकाश की ओर बढ़ा। नज़दीक पहुँचकर उसे वह आकृति में परिवर्तित होती दिखाई दी। एक रहस्यमयी स्त्री जैसे अंत काल से उसका इंतज़ार कर रही हो। उस महिला के लंबे सफ़ेद आँचल की ओर उसने हाथ बढ़ाया। जैसे ही उसकी उँगलियाँ आँचल तक पहुँची, वह आकृति ग़ायब हो गयी। सामने सिर्फ़ काला घना अंधेरा था। भय उसकी आँखों में स्पष्ट झलक रहा था। अब उसके सामने वही कुंडी वाला काला दरवाज़ा रह गया। आश्चर्यचकित होकर, उसने फिर धक्का देकर खोला। दोबारा उसी अंधेरे अंतहीन गलियारे को पार किया।

आगे उसे सोने का सिंहासन दिखाई दिया। ऐसी कल्पना हुई जैसे सभी प्रजाजन उसके नाम की जय-जयकार कर रहे हो। क़ीमती वस्त्र और आभूषण पहनकर, अभिमान से भरा, वह सिंहासन पर बैठने गया। पाँव आगे रखते ही, सिहंसान और प्रजा अदृश्य हो गए। नज़र आयी तो वही कुंडी, वही दरवाज़ा।

व्यग्रता के साथ उसने चारों तरफ़ देखा, गली सुनसान थी। किसी व्यक्ति या चीज़ की तलाश में वह पुनः द्वार के अंदर गया। एक बड़ी खाने की मेज सामने प्रकट हुई। उस पार अनेकों प्रकार के पकवान सजे रखे थे। अति भूखे व्यक्ति के समान वह खाने की ओर बढ़ा। अगले ही क्षण ना कोई मेज थी ना खाना। हाल-बेहाल वह उसी शुरुआत को दोहराता गया।

मोह माया के चंगुल में फँसा, सच्चाई और मिथक के दायरे धुँधले होते गए। वो जैसे अभिमन्यु, असह्य चक्रव्यूह के जाल में, सदैव के लिए फँस गया हो। अचानक एक आवाज़ आयी, एक अंतर्मन की पुकार …धीरे धीरे उसके कान में गुजार कर रही थी। बेक़रार वो आवाज़ की तरफ़ बढ़ा। वही अंधेरा, वही गली। आवाज़ के स्रोत के पास पहुँचकर देखा तो एक साया दिखाई दिया। वही कपड़े, वही हाथ, वही मुख। उसकी आँखो में उसे अपनी परछाई दिखाई दी। वह जैसे खुद को ही आइने में निहार रहा हो, वह अनजान होकर भी पहचाना हुआ व्यक्ति उसे द्वार की तरफ़ खींचकर ले गया।


पिछली घटनाओं की पुनरावृत्ति से परेशान, वह दरवाज़ा खोलने में असफल रहा। अपरिचित व्यक्ति ने जैसे अंधे का सहारा बनकर द्वार खोला। तीक्ष्ण रोशनी ने उसकी आँखों को चकाचौंध कर दिया। शनैः-शनैः उसे अपना परिवेश परिचित महसूस हुआ। आसपास देखा तो उस जाने-पहचाने परिवेश में वह अनजान आदमी दिखाई न पड़ा। परंतु इस बार कमरे का दरवाज़ा खुला तो बरसों से पहचाना हुआ, चाहा हुआ चेहरा दिखा। उसके साथ गुज़रे हुए समय की धुंधली तस्वीरें मन में घटित

क्या यह भी भ्रम था? क्या यही सचाई थी जो टूटकर उसी दरवाज़े के सामने बिखरेगी?

तृषा पवार, प्रथम वर्ष, आईआईटी गुवाहाटी

तृषा ने कुछ ही साल पहले लिखना शुरू किया है। वे अपने बनाए चित्रों पर कविताएँ लिखकर थोड़े समय में ज़िंदगी की घटनाओं पर लिखने लगी। यह विशेष कहानी एक मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के बारे में है। यह उसकी दुनिया के बारे में मेरी धारणा है जिसमें वह सचाई और भ्रम में फ़र्क़ नहीं देख सकता। तृषा को इंस्टाग्राम पर पाया जा सकता है।

Categories कहानी, Hindi Content

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